Friday, May 22, 2009

कहना तो है तुमसे...

कहना तो है तुमसे, डर है- तुम्हें खो न दूँ
साथ हो तो हँसी है, फिर कहीं रो न दूँ

यकीं मानो मेरा- कुछ तो नहीं मेरे पास देने को
वरना कुछ हो मेरे पास, और तुम्हें वो न दूँ

तुख्मे-मुहब्बत लिए भटकता फिरता हूँ शहरो-सहरा
चैन से कैसे बैठ रहूँ, जब तलक इन्हें बो न दूँ

ज़िंदगी की ताख पर बेतरतीब से पड़े हैं कुछ ख्वाब
ग़म फुर्सत दे तो, करीने-से इनको सँजो न दूँ

सफीना दिल का उतार तो दिया है लहरों पर, मगर
डरता हूँ- कहीं अपने हाथों, कश्ती अपनी डुबो न दूँ

जज्ब तू मुझमें है कि मैं तुझमें हूँ- कैसे कहूँ
बेखबर हूँ खुद से, खुद को कहीं तुझमें समो न दूँ

तुम्हें भूलने कि जिद में खुद को भूल गया हूँ
कहाँ मुमकिन- तू याद आये और मैं रो न दूँ


4 comments:

श्यामल सुमन said...

तुम्हें भूलने कि जिद में खुद को भूल गया हूँ
कहाँ मुमकिन- तू याद आये और मैं रो न दूँ

सुन्दर।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Udan Tashtari said...

उम्दा भावाव्यक्ति!! बधाई.

दिगम्बर नासवा said...

ज़िंदगी की ताख पर बेतरतीब से पड़े हैं कुछ ख्वाब
ग़म फुर्सत दे तो, करीने-से इनको सँजो न दूँ

खूबसूरत ग़ज़ल है.............लाजवाब शेर हैं

ARVI'nd said...

दिल को छु गयी आपकी ये ग़ज़ल...