Friday, November 28, 2008

वस्ल के दिन याद आए...

वस्ल के दिन याद आए, हिज़्र की रातें याद आईं
तुम याद आए तो न जाने कितनी बातें याद आईं

पहरों-पहर पहलू में जब खामोश धड़कते थे दो दिल
चुपचाप-सी पहले-पहल की वो मुलाकातें याद आईं

बूँद-बूँद रूह को भिंगोने की ख़्वाहिश रखती हों जैसे
तेरे गुनगुनाते लबों से नज़्मों की वो बरसातें याद आईं

थोड़ा-सा दर्द, थोड़ी-सी तड़प और थोड़े-से आँसू
जाते-जाते जो तुम दे गए, आज वो सौगातें याद आईं


4 comments:

"अर्श" said...

पहरों-पहर पहलू में जब खामोश धड़कते थे दो दिल
चुपचाप-सी पहले-पहल की वो मुलाकातें याद आईं

umda likha hai aapne wah dhero badhai aapko sahab.....

radhasaxena said...

Bahut achche.

नारदमुनि said...

charon or dard hee dard hai. narayan narayan

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
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