Monday, March 22, 2010

ढूँढता हूँ, इक मयखाना...

ढूँढता हूँ, इक मयखाना यहीं कहीं था
छलकता हुआ पैमाना यहीं कहीं था

लोग आते थे सजदे को दूर-दूर से
सुना है - इक बुतखाना यहीं कहीं था

जिंदगी से ऊबकर आता था मैं जहाँ
वो मेरा ठिकाना यहीं कहीं था

कोई पूछे तो कहते थे लोग
हाँ, एक दीवाना यहीं कहीं था

अभी-अभी रोया था मैं, और
उसका शाना यहीं कहीं था

मेरे हमदम, मेरे गमगुसार का
शायद आशियाना यहीं कहीं था


2 comments:

Richa P Madhwani said...

nice post....

विवेक मिश्र said...

Wah...क्षितीशji Subhanallah
apane facebook profile par bhi isaki link share kar diya hai aapki anumati ke bina..