Friday, December 5, 2008

लेकर हाथों में वो आईना...

लेकर हाथों में वो आईना पूछते हैं
मुझसे मेरी ज़िंदगी का मायना पूछते हैं

रोशनी अपने हिस्से की उन्हें दे चुका
फिर भी किसे कहते हैं चाहना- पूछते हैं

इस मासूमियत को आखिर क्या कहिए
क्यूँ भूल गया हूँ मैं हँसना, पूछते हैं

जिन लबों ने कभी आने को कहा नहीं
उन्ही लबों से, तुम आए क्यूँ ना- पूछते हैं

यूँ के जैसे मुझे पहचानते ही नहीं
कब से हो तुम मेरे आशना पूछते हैं

उफ्फ़! ये अदा, ये शोखी, ये अना
क्या है तेरी ज़िंदगी मेरे बिना, पूछते हैं


5 comments:

manvinder bhimber said...

के जैसे मुझे पहचानते ही नहीं
कब से हो तुम मेरे आशना पूछते हैं

उफ्फ़! ये अदा, ये शोखी, ये अना
क्या है तेरी ज़िंदगी मेरे बिना, पूछते हैं
bahut khoob,,,wah kya baat hai

mehek said...

जिन लबों ने कभी आने को कहा नहीं
उन्ही लबों से, तुम आए क्यूँ ना- पूछते हैं

यूँ के जैसे मुझे पहचानते ही नहीं
कब से हो तुम मेरे आशना पूछते हैं
bahut hi dilkash gazal badhai,ye sher bahut pasand aaye khas karke.

"अर्श" said...

bahot khub sahab jari rahe dhero badhai ..........khub likha hia aapne...

dr. ashok priyaranjan said...

बहुत अच्छी रचना है आपकी । भाव की प्रखर अिभव्यिक्त है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख- उदूॆ की जमीन से फूटी िहंदी गजल की काव्यधारा- िलखा हैं । समय हो तो पढें और प्रितकिर्या भी दें -

http://www.ashokvichar.blogspot.com

ranjan said...

सरल शब्दों में सुन्दर बात कह दी.. वाह!!