Saturday, February 11, 2012

ज़िंदगी के नाम...

चाँद की अंगीठी
सितारों के शरारे
बुझती शब है... आ,
कुछ उपले
(साँसों के)
और जला ले...

ये फ़कीर की रात है
कट ही जाएगी
सिमटते-सिकुड़ते-ठिठुरते
(जमाधन)
फटी कम्बल के सहारे...!!!


(अंगीठी = चूल्हा, शरारे = चिंगारियां, शब = रात, उपले = गाय के
गोबर से बना इंधन, जो गरीबों के चूल्हे में जलता है)


Sunday, February 5, 2012

तन्हाईयों का सबब है आदमी...

तन्हाईयों का सबब है आदमी
यूँ तो फिर तनहा कब है आदमी

कभी खलिश, सुकूँ, कभी खला
रूहो-ज़िस्म का तलब है आदमी

एक दिल, और वो भी पशेमाँ
कितना बेवज़ह-बेमतलब है आदमी

हर शख्स के हैं दो चेहरे यहाँ
खुद ही देव, खुद ही रब है आदमी

दो अलग उन्वान हैं आदमी-ओ-इन्सां
के पहले इन्सां हो ले, तब है आदमी


(खलिश = चुभन, खला = शून्य, तलब = कामना,
पशेमाँ = लज्जित, देव = शैतान, उन्वान = शीर्षक)


Sunday, December 11, 2011

रात - २ बिम्ब


सारी रात,
चाँद जलाया मैंने...

सितारे,
शरारों की मानिंद -
बादलों की राख में सुलगते रहे!

सुबह हुई तो रात,
मेरी आँखों की दो हाँडी में
चंद शबनमी क़तरे छोड़ गई...

सारी रात,
अपना दर्द पकाया मैंने...!


रात -
एक अंधी बुढ़िया भिखारन
चाँद का कटोरा लिए बैठी थी...

जाने किस कमबख्त ने
गरीब दुखियारन के कटोरे में
ठेस लगा दी -
सारे सिक्के सितारों के
बिखर गए जहाँ-तहाँ

आज तलक,
वो अभागन -
अपना खोया सरमाया ढूँढ रही है...!


Sunday, October 30, 2011

जेरे-लब ये हँसी नन्ही-सी...

जेरे-लब ये हँसी नन्ही-सी
कहकशाँ में धुली चाँदनी-सी

सुरमई रात, दिल का आँगन
और तुम, कोई परी-सी

तुम, मैं और ये जज़्बात
चाँद, रात और मयकशी-सी

बिखरी-बिखरी निखरी-निखरी
हर तरफ इक रोशनी-सी

सौ अंजुम यकहा जल उठे
यूँ रुखसार पे लौ लहकी-सी

लम्हों के ज़िस्म पर तेरा लम्स
लिख रही दास्ताँ अनकही-सी


Sunday, October 23, 2011

वक़्त-बेवक़्त अदबो-आदाब की बातें...

वक़्त-बेवक़्त अदबो-आदाब की बातें
उनके लफ्ज़, गोया किताब की बातें

पेश्तर इससे कि कुछ हम भी कहते
ख़ल्क कह उठी- "सब ख्वाब की बातें"

जुल्मते-दौरां के मारे क्यों उठ बैठे
जो हमने ज़रा की माहताब की बातें

ज़ख्मे-खार को सीने में छुपा के कहीं
की चमन से हमने बस ग़ुलाब की बातें

बरहनाई का शौक जिनको था कभी
उनसे भी सुनी हमने हिजाब की बातें

कुछ देर तलक और बैठ साक़ी यहाँ
के बाकी बहुत हैं मेरे अज़ाब की बातें