Monday, October 10, 2011

एक ख्व़ाब और वो भी...

एक ख्व़ाब और वो भी
मिली पराई-सी
हर जानिब मिली हमें,
इक तन्हाई-सी

करके ज़ुदा ख़ुद से तेरे
ख़याल को हम
जिस राह निकले, मिली
तेरी परछाईं-सी

दर्द एक दुल्हन हो जैसे,
जब आई इस घर
कुछ ताने दुनिया ने दे दिए,
मुँहदिखाई-सी

चलो ये भरम ही सही हमारा,
मगर यूँ हुआ
ज़िंदगी जब भी मिली हमसे,
मिली शरमाई-सी

ये किस गली आ गए हैं हम
के लोगों यहाँ
फ़कीरे-इश्क़ को घर-घर
मिली रुसवाई-सी


Sunday, October 2, 2011

वक़्त - एक धुनिया

कोई है -
सरफिरा कोई,
अपने ही घर की दीवारों से
कान लगाए कहीं कुछ सुनता है

नहीं,
दीवाना है कोई -
वक़्त की शाख से झरे चंद फूल
शाम ढले, सन्नाटे में छुपकर चुनता है

कोई,
कैसे समझाए
ये जो दिल है, ये हर शब
एक नया ख्व़ाब क्यों बुनता है

वक़्त -
एक धुनिया
लम्हों की कपास एक कोने में
बैठा-बैठा, रोज यूँ ही धुनता है

तन्हा,
कुछ ख़फा-सा
दिल आज फिर गुमसुम
मन ही मन, जाने क्या गुनता है


Monday, September 26, 2011

दर्द से भींगती रहीं आँखें...

दर्द से भींगती रहीं आँखें, परवाह न किया
हाथ रखा सीने पर, फिर भी आह न किया

यूँ तो मुझसे भी हँसकर मिली थी ख़ुशी
दो पल से मगर ज्यादा निबाह न किया

सूखी धरती, बंजर सपने, बयाबान दिल
मेरी तरह किसी ने जिंदगी तबाह न किया

मुन्तजिर रहकर एक उम्र काट दी मैंने
किसी ने मगर, इस तरफ निगाह न किया


Wednesday, September 21, 2011

हासिल

बरसों तलक मैं
सहेजता रहा
आँसू के हर एक क़तरे को
अपनी पलकों के
सीपियों में

जमा करता रहा उस पर
दर्द की परत दर परत
इस उम्मीद में कि इक रोज़
ये मेरे सारे आँसू
बन जायेंगे मोती

मगर आज,
जब अचानक मैंने
अपने दिल के खजाने को टटोला
ग़म के चंद हीरे
मेरे हाथ लग गए...

वो आँसू मेरा सरमाया था,
ये ग़म मेरा हासिल है !!!


Friday, September 16, 2011

दो मुख़्तसर नज़्म...

 
"ना..." आत्मघात




सरे-शाम आत्मघात के
लिपटी पड़ी थी इरादे से
मुझसे फिर आँख की
मेरी तन्हाई... छत पर
चढ़े आँसू/
इस तन्हाई से चार पल
सख्त नफरत है मुझे ठहरे,
पर, तुम्हें ढूँढा -
और फिर
जब भी बाँहें खोले टप्प-से
आती है- गिर पड़े आँसू...!

मैं "ना"
नहीं कर पाता...!