
रात जनाज़ा निकला था चाँद का
सितारे आए थे मय्यत में रोने,
आसमाँ ने अपने हाथों
एक सफ़ेद-शफ्फाफ-सा अब्र
ढक दिया था लाश के बदन पर...
बतौर कफ़न
और मैं, खामोश ये दर्द पी रहा था
जब तुमने मेरे हाथों में थमा दी थी कुदाल
मैंने अपने दिल की ज़मीन पर
आहिस्ते-से एक छोटा सा कब्र खोदा
और उसकी लाश कर दी मैंने...
चुपके से दफ़न
अब से मेरी हसरतों के आसमान पर
चाँद नहीं उगेगा कभी...!
