Sunday, September 11, 2011

चाँद नहीं उगेगा कभी


रात जनाज़ा निकला था चाँद का
सितारे आए थे मय्यत में रोने,
आसमाँ ने अपने हाथों
एक सफ़ेद-शफ्फाफ-सा अब्र
ढक दिया था लाश के बदन पर...
बतौर कफ़न

और मैं, खामोश ये दर्द पी रहा था
जब तुमने मेरे हाथों में थमा दी थी कुदाल
मैंने अपने दिल की ज़मीन पर
आहिस्ते-से एक छोटा सा कब्र खोदा
और उसकी लाश कर दी मैंने...
चुपके से दफ़न

अब से मेरी हसरतों के आसमान पर
चाँद नहीं उगेगा कभी...!


Saturday, September 3, 2011

जिस रोज़ तेरे ज़िस्म के...

जिस रोज़ तेरे ज़िस्म के फूल महक जायेंगे
तुम्हारी कसम, हम थोड़ा सा बहक जायेंगे

शोलों को ग़र देती रही यूँ ही तुम हवा
बेशक़ इक रोज़ हम भी दहक जायेंगे

अब तो अक्सर ये हाल रहेगा तुम्हारा
सोचोगी मुझे और आँचल ढलक जायेंगे

छोडो भी शरमाना, पलकों को यूँ झुकाना
ये जो मय है आँखों में, छलक जायेंगे

अब जो छत पे आना, जरा चुपके से आना
राज़ खुल जाएगा, ग़र पाज़ेब खनक जायेंगे

कभी ये ग़ज़ल मेरी तुमसे मिले कहीं तो -
मिल बैठना, बातें करना, रुखसार दमक जायेंगे


Sunday, August 28, 2011

उदास आँखों का ख्वाब...



बस वही उदास आँखें, और उदास आँखों का ख्वाब
यही दो जहाँ मेरे, यही दो जहाँ का असबाब

एक-एक सतर, एक-एक सफहा, एक-एक बाब
'जिंदगी' उन्वान है जिसका, पढ़ता रहा हूँ वही किताब

यहीं कहीं दिलों की पनाह में एक आशियाँ हो मेरा
फिर क्या करना है दोज़खो-बहिश्त, अज़ाबो-सवाब

मैं अपने तौर पर जीने निकला हूँ, जी लूँगा
दुनिया, तू अपने ही पास रख अपने आदाब

मैंने दिल में मुहब्बत के चराग़ जला रखे हैं
वो चराग़ जिससे रश्क खाते हैं आफ्ताबो-माहताब

इक नूर से रोशन हैं लम्हा-लम्हा वादियाँ मेरे दिल की
देखें अब तारीकियाँ होती हैं किस तरह कामयाब

वक़्त की नज़र बचाकर चुरा रखा था मैंने जिसे
अक्सर तन्हाइयों में भीने-भीने महकता है वो गुलाब

बारहा सन्नाटों की आवाज़ ग़ज़ल बन जाती है
ये ग़ज़ल किसलिए? मुझसे पूछते हैं मेरे अहबाब


Monday, March 22, 2010

ढूँढता हूँ, इक मयखाना...

ढूँढता हूँ, इक मयखाना यहीं कहीं था
छलकता हुआ पैमाना यहीं कहीं था

लोग आते थे सजदे को दूर-दूर से
सुना है - इक बुतखाना यहीं कहीं था

जिंदगी से ऊबकर आता था मैं जहाँ
वो मेरा ठिकाना यहीं कहीं था

कोई पूछे तो कहते थे लोग
हाँ, एक दीवाना यहीं कहीं था

अभी-अभी रोया था मैं, और
उसका शाना यहीं कहीं था

मेरे हमदम, मेरे गमगुसार का
शायद आशियाना यहीं कहीं था


Friday, July 3, 2009

मुहब्बत के ये पल...

मुहब्बत के ये पल याद रखना
हम हों ना हों कल, याद रखना

तन्हाई में जब कभी आयेगा ख़याल
भीगेंगे आँखों के कँवल, याद रखना

मेरी दुनिया, मेरी ज़िंदगी- तुम्हीं से
हुई है मुकम्मल, याद रखना

पहनोगे जब भी मेरी यादों के लिबास
हवा उड़ाएगी आँचल, याद रखना

मैं याद रखूँगा ये शोखियाँ तुम्हारी
तुम भी मेरे आँसू चंचल, याद रखना